राजस्थान हाईकोर्ट ने जोधपुर प्रधान पीठ की संरचनात्मक कमियों पर जताई गंभीर चिंता, समयबद्ध कार्रवाई के निर्देश
- केंद्रीय गुंबद के पुनर्वास से जुड़े पुराने अनुबंध पर भी उठे सवाल; जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई के निर्देश
जोधपुर, रविवार, 30 अगस्त 2026। राजस्थान हाईकोर्ट ने जोधपुर स्थित अपनी प्रधान पीठ के भवन में सामने आई गंभीर संरचनात्मक कमियों को लेकर राज्य सरकार और सभी संबंधित अधिकारियों को तत्काल एवं समयबद्ध कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं, न्यायालय कर्मचारियों तथा परिसर में आने वाले नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने को कहा है। इस मामले में यह भी सामने आया है कि केंद्रीय गुंबद के पुनर्वास का कार्य राजस्थान स्टेट रोड डेवलपमेंट एंड कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (RSRDC) द्वारा मुंबई की Structural Specialties and Projects India Pvt. Ltd. (SSPL) को दिए गए पूर्व के फेज-II संरचनात्मक पुनर्वास अनुबंध का हिस्सा था। यह अनुबंध करीब 8.10 करोड़ रुपये की लागत पर दिया गया था, जबकि अनुमानित निविदा मूल्य लगभग 11.10 करोड़ रुपये था। SSPL सबसे कम बोलीदाता (L1) के रूप में सामने आई थी और उसकी बोली अनुमानित राशि से करीब 27 प्रतिशत कम थी। अनुबंध में गुंबद क्षेत्र के लिए अलग से “Part B – Dome Area” शामिल था, जिसमें विस्तृत निरीक्षण, गैर-विनाशकारी परीक्षण, जंग का उपचार, एपॉक्सी एवं माइक्रोफाइन सीमेंट ग्राउटिंग, जंग-रोधी उपाय, मचान तथा अन्य विशेष पुनर्वास कार्य शामिल थे। परियोजना से जुड़े लोगों के अनुसार, गुंबद से संबंधित ये कार्य कथित तौर पर नहीं किए गए। यदि आधिकारिक रिकॉर्ड से इसकी पुष्टि होती है, तो यह सवाल उठता है कि अनुबंध के दायरे में पहले से शामिल कार्य लंबित क्यों रहे और RSRDC द्वारा इस संबंध में क्या संविदात्मक कार्रवाई की गई।
माननीय डॉ. न्यायमूर्ति पुष्पेंद्र सिंह भाटी और माननीय सुश्री न्यायमूर्ति रेखा बोराणा की खंडपीठ ने डी.बी. सिविल रिट याचिका संख्या 19427/2026 में ये निर्देश जारी किए। मामला हाईकोर्ट भवन की संरचनात्मक मजबूती एवं सुरक्षा, विशेष रूप से केंद्रीय गुंबद तथा उससे जुड़ी संरचनाओं को लेकर स्वतः संज्ञान से शुरू की गई कार्यवाही से संबंधित है। न्यायालय ने 10 अगस्त 2026 को मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए भवन की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। पीठ ने राज्य के अधिकारियों तथा अन्य संबंधित पक्षों से भवन में सामने आई संरचनात्मक एवं सामग्री संबंधी कमियों के कारणों पर स्पष्टीकरण मांगा था। न्यायालय ने कहा कि यह भवन केवल एक भौतिक संरचना नहीं, बल्कि कानून के शासन, संविधान और लोकतंत्र का प्रतीक है। ऐसे में इसकी संरचनात्मक स्थिति से जुड़ी चिंताएं परिसर में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की सुरक्षा, विश्वास और आस्था से सीधे जुड़ी हैं।
कार्यवाही के दौरान न्यायालय ने आईआईटी बॉम्बे और आईआईटी जोधपुर से जुड़े विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत संरचनात्मक आकलन एवं प्रस्तुतियों पर भी विचार किया। 20 अगस्त 2026 की आईआईटी बॉम्बे की संरचनात्मक ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि केंद्रीय गुंबद की मरम्मत संभव है और उसकी संरचनात्मक मजबूती को मूल स्तर तक बहाल किया जा सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि वर्तमान में गुंबद के तत्काल ढहने का खतरा नहीं है और उसे गिराने की सिफारिश नहीं की गई है। हालांकि, मरम्मत कार्य शुरू करने से पहले उचित मजबूती एवं सहायक व्यवस्थाओं के साथ राष्ट्रीय भवन संहिता, 2005 के अनुसार समयबद्ध मरम्मत आवश्यक बताई गई है।
आईआईटी जोधपुर के विशेषज्ञों ने, जो वर्ष 2023 से भवन के संरचनात्मक आकलन से जुड़े हुए हैं, न्यायालय को बताया कि प्रारंभिक स्तर पर कई चिंताएं सामने आई थीं। इनमें स्टील सुदृढ़ीकरण में जंग, कंक्रीट में जंग के कारण दरारें, स्लैब पर प्लास्टर के पैच, निर्माण जोड़ों के पास टाइलों का अलग होना तथा छत की सील में दरारें शामिल हैं। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि भवन की बहाली का कार्य अलग-अलग हिस्सों में करने के बजाय व्यापक स्तर पर किया जाना चाहिए। कार्यवाही में दर्ज किया गया कि लगभग 66,000 वर्ग फुट के कुल क्षेत्रफल में से करीब 11,000 वर्ग फुट क्षेत्र में अब तक काम किया जा चुका है।
आईआईटी बॉम्बे के एक प्रोफेसर ने न्यायालय को बताया कि भवन के करीब 60 प्रतिशत हिस्से को तत्काल और अत्यावश्यक ध्यान की आवश्यकता है। उन्होंने भवन की संरचनात्मक कमियों को दूर करने तथा इसके निरंतर एवं सुरक्षित संचालन के लिए दीर्घकालिक समाधान सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विशेषज्ञों के नेतृत्व में व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
राज्य सरकार ने सुधार कार्य जारी होने की दी जानकारी
राज्य सरकार ने न्यायालय को बताया कि भवन में सुधार एवं बहाली के उपाय जारी हैं तथा भवन की मजबूती और संरचनात्मक सुरक्षा बहाल करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। महाधिवक्ता ने पीठ को बताया कि 12 और 19 अगस्त को बैठकें आयोजित की गई थीं, जिसके बाद उच्च स्तर पर संबंधित पक्षों एवं एजेंसियों से रिपोर्ट मांगी गई।
राज्य की ओर से यह भी बताया गया कि जहां भी चूक सामने आई है, वहां आवश्यक कार्रवाई की जा रही है। नौ व्यक्तियों के खिलाफ पहले ही आरोप-पत्र दाखिल किया जा चुका है तथा लागू सीसीए नियमों के तहत कार्रवाई जारी है।
कम दर पर ठेका मिलने से काम नहीं होने का दावा
परियोजना से जुड़े लोगों के अनुसार, गुंबद से संबंधित कार्य कथित तौर पर इसलिए नहीं किए गए क्योंकि ठेकेदार द्वारा अनुमान से काफी कम दरों पर काम लिए जाने के कारण उनका निष्पादन व्यावसायिक रूप से कठिन हो गया था। यदि आधिकारिक रिकॉर्ड से इसकी पुष्टि होती है, तो यह गंभीर सवाल उठता है कि अनुबंध के दायरे में पहले से शामिल कार्यों को लंबित क्यों रहने दिया गया और संबंधित एजेंसी द्वारा ठेकेदार के विरुद्ध क्या संविदात्मक कार्रवाई की गई।
यह मुद्दा न्यायालय द्वारा जिम्मेदारी तय करने और जवाबदेही की कार्रवाई को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने पर दिए गए जोर से भी सीधे जुड़ा हुआ है।
50 साल तक भवन को सुरक्षित रखने का लक्ष्य
लोक निर्माण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव ने न्यायालय को आश्वस्त किया कि राज्य सरकार चल रही सुधारात्मक प्रक्रिया के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। भवन की निर्धारित मजबूती और दीर्घकालिक उपयोगिता बहाल करने के लिए विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए सभी कदम उठाए जाएंगे। वित्त सचिव ने भी सरकार की प्रतिबद्धता का आश्वासन दिया।
राज्य सरकार ने न्यायालय को बताया कि विशेषज्ञों और राज्य की टीम के समन्वय से यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा कि भवन कम से कम अगले 50 वर्षों तक संरचनात्मक रूप से सुरक्षित एवं मजबूत बना रहे।
जिम्मेदारी तय करने और कार्रवाई के निर्देश
खंडपीठ ने संबंधित अधिकारियों को जांच एवं सुधारात्मक उपायों को पूरी तरह आगे बढ़ाने तथा अगली सुनवाई में अब तक हुई प्रगति और प्रस्तावित कार्ययोजना का विस्तृत विवरण न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जिम्मेदारी तय की जाए और जिन व्यक्तियों को जिम्मेदार पाया जाए, उनके खिलाफ उचित कार्रवाई समयबद्ध तरीके से उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाई जाए।
न्यायालय ने न्यायिक बुनियादी ढांचे की निगरानी के लिए प्रतिनियुक्ति अथवा स्वतंत्र नियुक्ति के माध्यम से इंजीनियरों की एक समर्पित टीम गठित करने पर भी विचार करने को कहा है। अंतरिम अवधि में सुरक्षा के लिए आईआईटी विशेषज्ञों के सुझाव के अनुसार नियमित निगरानी के निर्देश दिए गए हैं। सुधारात्मक कार्रवाई का दायरा अधिवक्ताओं के चैंबर तक भी विस्तारित किया गया है।
सभी संबंधित अधिकारियों को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से न्यायालय के समक्ष उपस्थित रहने तथा दोषी अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई, पुनर्वास एवं सुधारात्मक उपायों और प्रस्तावित भविष्य की कार्ययोजना से संबंधित रिकॉर्ड प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।
न्यायालय ने यह भी संकेत दिया है कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर दोषी अधिकारियों के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां और अवमानना कार्यवाही शुरू करने पर विचार किया जा सकता है। इसमें वे अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं, जिनकी निष्क्रियता के कारण जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई नहीं हो सकी। मामले में अगली सुनवाई 15 सितंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
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