अदालत ने संसद की सुरक्षा, संरक्षा तंत्र की समीक्षा के अनुरोध वाली जनहित याचिका खारिज की

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नई दिल्ली, बुधवार, 05 अगस्त 2026। दिल्ली उच्च न्यायालय ने संसद की सुरक्षा और संरक्षा को लेकर चिंता जताने वाली एक जनहित याचिका बुधवार को खारिज कर दी। याचिका में संसद के ''निर्बाध संवैधानिक कामकाज'' को सुनिश्चित करने का अनुरोध किया गया था। याचिका में 2001 में संसद परिसर पर हुए आतंकवादी हमले और 2023 में हुई सुरक्षा चूक का हवाला देते हुए अधिकारियों को मौजूदा संस्थागत सुरक्षा ढांचे की व्यापक समीक्षा करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। इसमें प्रशासनिक, संस्थागत, परिचालन, तकनीकी और साइबर सुरक्षा तंत्र की समीक्षा भी शामिल थी।

मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा, ''ये अदालत के काम नहीं हैं। संसद के कामकाज के संबंध में ऐसा कोई निर्देश कैसे जारी किया जा सकता है? क्या आपको लगता है कि इस देश की संसद अपनी सुरक्षा का ध्यान रखने में सक्षम नहीं है? यह कैसी याचिका है? क्या हम संसद को यह निर्देश देने के लिए हैं कि उसके प्रशासनिक और परिचालन तंत्र को कैसे काम करना चाहिए?'' पीठ ने कहा कि संसद की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे को सरकार को देखना होगा और याचिकाकर्ता के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि संसदीय लोकतंत्र में ''संसद सर्वोच्च'' है और उसकी सुरक्षा की समीक्षा ''समय की जरूरत'' है। पीठ ने कहा कि उसे यह समझ नहीं आ रहा कि इस मुद्दे पर कानून बनाने संबंधी याचिकाकर्ता के अनुरोध पर विचार करने के लिए प्राधिकारियों को निर्देश कैसे जारी किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति की सुरक्षा महत्वपूर्ण है और याचिकाकर्ता से कहा कि हर विचार को जनहित याचिका का विषय नहीं बनाया जा सकता।

पीठ ने कहा, ''रेलवे स्टेशन पर भगदड़ होती है, आप उसे नहीं देखते। पैदल चलने वालों के सामने सुरक्षा संबंधी चिंताएं हैं, आप उन्हें नहीं देखते। सुबह टहलने वालों की सुरक्षा चिंता को आप नहीं देखते। रेलवे स्टेशनों पर रोजाना जाने वाले यात्रियों की सुरक्षा चिंता का विषय नहीं है?'' राज सिंह की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि संसद की सुरक्षा की समीक्षा का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि सांसदों को निशाना बनाकर किए जाने वाले प्रदर्शनों की संख्या बढ़ रही है।

याचिका में कहा गया था, ''नागरिकों से संसद की ओर मार्च करने या एकत्र होने (संसद चलो) की अपील विभिन्न सार्वजनिक मुद्दों पर लोकतांत्रिक लामबंदी की एक बार-बार दिखाई देने वाली प्रवृत्ति बन गई है। जहां शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संवैधानिक रूप से संरक्षित हैं, वहीं ऐसे घटनाक्रम यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता को भी रेखांकित करते हैं कि मौजूदा सुरक्षा ढांचा लोकतांत्रिक भागीदारी की रक्षा और संसद की संस्थागत अखंडता तथा निर्बाध कार्यप्रणाली को बनाए रखने में सक्षम रहे।'' याचिका में केंद्र के साथ-साथ लोकसभा और राज्यसभा सचिवालयों को भी निर्देश देने का अनुरोध किया गया था कि ''वे बदलती सुरक्षा चुनौतियों और उभरते खतरों को देखते हुए भारत की संसद की सुरक्षा, संरक्षा, मजबूती और निर्बाध संवैधानिक कामकाज से संबंधित मौजूदा संस्थागत ढांचे की व्यापक समीक्षा करें।''

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