दो राज्य नहीं सुलझा पा रहे रसगुल्ले की ल़डाई

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आपने जमीन, गांव, राज्य आदि के बंटवारे को लेकर व एक दूसरे की साख बचाने को लेकर ल़डाई झग़डे के किस्से तो बहुत सुने होंगे। ऎसा नहीं सुना होगा कि एक मिठाई को लेकर दो राज्य आपस में भि़ड जाएं। विवाद यहां तक पहुंच जाए कि वो मिठाई के आपसी झग़डे को सुलझा ही न पाएं।

जी हां ऎसा ही एक मामला आया है रसगुल्ले का रसगुल्ले को लेकर दो राज्य आपस में भि़ड गए हैं। रसगुल्ले पर अपने हक को लेकर दोनो राज्य आपस में इस पर अपना अपना दावा कर रहे हंै। दरअसल बात रसगुल्ले के जन्म को लेकर है। रसगुल्ले के जन्म को लेकर बंगा और ओडिशा आपस में उलझ गए हैं। ताजा विवाद तब शुरू हुआ जब ओडिशा सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर 5 पर कटक और भुवनेश्वर के बीचोंबीच स्थित पाहाल में मिलने वाले मशहूर रसगुल्ले को जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानी जी आई मान्यता दिलाने के लिए कोशिशें शुरू कीं। जियोग्राफिकल इंडिकेशन वो चिन्ह है जो किसी उत्पाद पर उस स्थान विशेष की पहचान बताने के लिए लगाया जाता है। इससे ये भी पता चलता है कि ये उत्पाद उस जगह की क्या विशेषता लिए हुए है। बंगाल, अब ओडिशा के इस दावे को चुनौती देने के लिए जुट गया है।

बंगाल ने किया रसगुल्ले पर दावा

बंगाल के मशहूर रसगुल्ला निर्माता केसी दास के वारिस राज्य के ही मशहूर इतिहासविद् हरिपद भौमिक की मदद से ऎसे तथ्य जुटाकर एक बुकलेट तैयार करा रहे हैं जो रसगुल्ले की पैदाइश बंगाल में होने की पुष्टि करेगी। उसके बाद इस बुकलेट को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंपने की योजना है। बंगाल का हमेशा से दावा रहा है कि रसगुल्ला बंगाल की देन है। लेकिन अब ओडिशा ने इस दावे को यह कहकर चुनौती दी है कि साल 1868 में बंगाल में रसगुल्ले के आविष्कार से डेढ़ सौ साल पहले इस रसीली मिठाई का जन्म पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर में हुआ।

किसका है रसगुल्ला

इस विषय पर शोध करने वाले कई विशेषज्ञों का कहना है कि नीलाद्रि वीजे (रथ यात्रा के बाद जिस दिन भगवान जगन्नाथ वापस मंदिर में आते हैं) के दिन भगवान जगन्नाथ के देवी लक्ष्मी को मनाने के लिए रसगुल्ला पेश करने की परंपरा कम से कम तीन सौ साल पुरानी है। मान्यता है कि जब भगवान जगन्नाथ रथयात्रा से वापस आते हैं तो महालक्ष्मी उनसे नाराज रहती हैं और महल का दरवाजा नहीं खोलतीं क्योंकि जगन्नाथ उन्हें अपने साथ नहीं ले गए होते। तब रूठी देवी को मनाने के लिए भगवान जगन्नाथ उन्हें रसगुल्ला पेश करते हैं। जगन्नाथ संस्कृति के जाने माने विशेषज्ञ सूर्य नारायण रथ शर्मा तो दावा करते हैं कि यह परंपरा एक हजार साल पुरानी है।

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