राष्ट्रीय वाद नीति की समीक्षा करेगी संसदीय समिति

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नई दिल्ली, गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026। संसद की एक समिति ने ‘राष्ट्रीय वाद नीति’ के निर्माण और क्रियान्वयन की समीक्षा करने का फैसला किया है, जबकि सरकार इस योजना को पहले ही खारिज कर चुकी है।सरकार ने पिछले साल केंद्रीय मंत्रालयों, विभागों तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) को मुकदमों की संख्या कम करने के लिए निर्देश जारी किए थे। लोकसभा बुलेटिन के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राज्यसभा सदस्य सुजीत कुमार की अध्यक्षता वाली कार्मिक, लोक शिकायत, विधि एवं न्याय संबंधी संसद की नवगठित स्थायी समिति ने 2026-27 में समीक्षा के लिए ‘राष्ट्रीय मुकदमा नीति का निर्माण और क्रियान्वयन’ विषय चुना है। सरकार वर्षों से राष्ट्रीय वाद नीति तैयार करने पर विचार कर रही थी, जिसका उद्देश्य सरकार और उसके विभागों को देश के सबसे बड़े वादकारियों में शामिल होने की स्थिति से बाहर निकालना था।

हालांकि, केंद्रीय विधि मंत्रालय ने 2025 में राष्ट्रीय मुकदमा नीति लाने की योजना छोड़ दी। इसके बजाय विधि कार्य विभाग ने अप्रैल 2025 में ‘भारत सरकार द्वारा मुकदमों के कुशल और प्रभावी प्रबंधन के लिए निर्देश’ जारी किए। इन निर्देशों का उद्देश्य कानूनी प्रक्रियाओं को सरल बनाना, अनावश्यक मुकदमेबाजी रोकना, अधिसूचनाओं और आदेशों में विसंगतियों को दूर करना तथा अदालतों में गैर-जरूरी अपीलों को कम करना है। सचिवों की एक समिति ने इन निर्देशों को मंजूरी दी थी और इनकी सालाना समीक्षा किए जाने का प्रावधान है।

विधि मंत्रालय ने फरवरी, 2025 में राज्यसभा को बताया था कि विभिन्न अदालतों में लंबित करीब सात लाख मामलों में केंद्र सरकार एक पक्षकार है। इनमें लगभग 1.9 लाख मामलों में वित्त मंत्रालय पक्षकार है। राष्ट्रीय वाद नीति पर कई वर्षों से विभिन्न सरकारें विचार करती रही हैं। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग)-दो सरकार के दौरान तत्कालीन विधि मंत्री एम. वीरप्पा मोइली ने 2010 में ऐसी नीति तैयार की थी, लेकिन उसे केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी नहीं मिल सकी। उस समय नीति का उद्देश्य अदालतों में मामलों के लंबित रहने की औसत अवधि 15 वर्ष से घटाकर तीन वर्ष करना था।

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