न्यायमूर्ति दिवाकर ने फुल कोर्ट की बैठकों में चर्चा की गुणवत्ता पर सवाल उठाए

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प्रयागराज, शुक्रवार, 02 अक्टूबर 2026। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने यह कहते हुए अदालत के पूर्ण पीठ की बैठकों में चर्चाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठाए हैं कि इन बैठकों में अलग अलग न्यायाधीशों की सहमति या असहमति, उनकी कार्यवाही में दर्ज नहीं की जाती है। अदालत का पूर्ण पीठ वह मंच है जिसमें एक उच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीश शामिल होते हैं जो महत्वपूर्ण संस्थागत और प्रशासनिक मामलों पर चर्चा करते हैं।

पप्पू मेट उर्फ पप्पू बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के मामले में 28 सितंबर को दिए अपने 80 पेज के निर्णय में न्यायमूर्ति दिवाकर ने यह भी कहा कि ऐसी धारण थी कि पिछली दो पूर्ण पीठ बैठकें उसी तरह पहले से तय थीं जैसे सरकार किसी विश्वास मत के दौरान अपने सदस्यों से अपनी बात मनवाती है। न्यायमूर्ति दिवाकर ने उच्च न्यायालय प्रशासन के उच्च न्यायाधीश केंद्रित मॉडल की समीक्षा किए जाने का आह्वान किया और साथ ही अधिक विचार-विमर्श वाले, संस्थागत रूप से संतुलित और भागीदारीपूर्ण दृष्टिकोण की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा कि इसमें मजबूत संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

न्यायाधीश की यह टिप्पणी उन चार मामलों में निर्णय में आई जिनमें उन्होंने अधीनस्थ न्यायपालिका में विलंब, जमानत पर निर्देशों का अनुपालन नहीं किया जाना और न्यायिक अनुशासन से जुड़ी व्यापक चिंताएं व्यक्त की। उच्च न्यायालय के प्रशासनिक कामकाज के संदर्भ में न्यायमूर्ति दिवाकर ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय नियमों, 1952 का हवाला दिया जिसके तहत मुख्य न्यायाधीश को हर तीन महीने में एक पूर्ण पीठ की बैठक बुलानी होती है जिसमें ग्रीष्मकालीन अवकाश शामिल नहीं है। हालांकि उन्होंने कहा कि पिछले 10 वर्षों में केवल 16 पूर्ण पीठ की बैठकें बुलाई गई हैं।

निर्णय में कहा गया, “इस दौरान, आम नीति, अदालत की शक्तियों और स्थिति पर असर डालने वाले किसी मामले या न्याय-प्रशासन पर कोई सालाना रिपोर्ट पूर्ण पीठ के समक्ष पेश नहीं की गई।” यह सवाल उठाते हुए कि क्या पूर्ण पीठ एक सार्थक सामूहिक मंच के तौर पर काम कर रहा है, न्यायमूर्ति दिवाकर ने कहा कि इसका आधार न्यायाधीशों की व्यक्तिगत राय को “आपसी मान्यता” देने के सिद्धांत पर टिका हुआ है। उन्होंने कहा कि अलग अलग न्यायाधीशों की राय को शामिल किए बगैर प्रस्तावों को दर्ज करने से फोरम का संस्थागत मकसद पूर्ण रूप से पूरा नहीं हो सका। निर्णय में यह भी कहा गया कि मुख्य न्यायाधीश द्वारा बनाई गई समितियों की कार्यवाही का विवरण कभी पूर्ण पीठ को नहीं बताया गया जिससे यह धारणा बनी उनका कामकाज उच्च न्यायालय से स्वतंत्र था।

न्यायमूर्ति दिवाकर ने आगे कहा कि काम का आबंटन, प्रदर्शन से जुड़ा नहीं था और पदोन्नति पर विचार करने के लिए “कोई परिभाषित, संहिताबद्ध और अधिसूचित मानदंड नहीं थे।” पक्षपात, भेदभाव या अन्य बाहरी कारणों के साबित होने पर जवाबदेही तय करने की जरूरत का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “सबसे बड़ी बात यह है कि प्रशासनिक स्तर पर किए गए निर्णयों के लिए कोई जवाबदेही तय नहीं होती है और ना ही किसी स्वतंत्र एजेंसी उनका अंकेक्षण कराया जाता है।” न्यायमूर्ति दिवाकर ने चेताया कि यदि इन मुद्दों को संयम के साथ नहीं सुलझाया गया तो इससे संस्थागत अनुशासन कमजोर हो सकता है और कानून के शासन को नुकसान पहुंच सकता है। उन्होंने उच्च न्यायालय के निबंधक (अनुपालन) को इस निर्णय की प्रति मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया ताकि माननीय मुख्य न्यायाधीश इस पर गौर करके उचित कदम उठा सकें।

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