बंगाल चुनावः दूसरे चरण का मतदान बुधवार को, भाजपा एवं तृणमूल दोनों के लिए परीक्षा की घड़ी
कोलकाता, मंगलवार, 28 अप्रैल 2026। पहले चरण में 93 प्रतिशत से अधिक के रिकॉर्ड मतदान और तृणमूल कांग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दावों के साथ, पश्चिम बंगाल चुनाव अब अपने सबसे निर्णायक चरण में पहुँच गया है, जहाँ बुधवार को आठ जिलों के 142 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान होगा। कोलकाता और दक्षिण बंगाल पारंपरिक रूप से तृणमूल का मजबूत गढ़ माने जाते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा छह जनसभाएं और दो रोड शो करने के साथ यह स्पष्ट हो गया है कि भाजपा इस रूझान को तोड़ने के लिए बेताब है।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, इस चरण में एक करोड़, 64 लाख ,35 हजार, 627 पुरुष, एक करोड़, 57 लाख, 37 हजार, 418 महिलाएं और 792 तीसरे लिंग के मतदाताओं सहित कुल तीन करोड़, 21 लाख, 73 हजार, 837 मतदाता 41,001 मतदान केंद्रों पर अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इन सभी मतदान केंद्रों पर वेबकास्टिंग निगरानी की व्यवस्था होगी। इन जिलों की सामाजिक संरचना, मतदाताओं की संख्या और विविधता इस चरण को न केवल संख्यात्मक बल्कि राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण बनाती है।
निर्वाचन क्षेत्र आठ प्रमुख जिलों- उत्तर कोलकाता (7 सीटें), दक्षिण कोलकाता (4), उत्तर 24 परगना (33), दक्षिण 24 परगना (31), हावड़ा (16), नदिया (17), हुगली (18) और पूर्व बर्धमान (16) में फैले हुए हैं, जिनमें तीन जिलों में अंतरराष्ट्रीय और नदी सीमाएं इसे न केवल राजनीतिक रूप से बल्कि सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। जनसांख्यिकीय रूप से, दक्षिण 24 परगना, हावड़ा और दक्षिण कोलकाता के बड़े हिस्सों में महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक आबादी है, जबकि नदिया और उत्तर 24 परगना जैसे जिलों में पर्याप्त मतुआ और शरणार्थी समुदाय शामिल हैं, जहां पहचान और नागरिकता का मुद्दा प्रमुख है।
उल्लेखनीय है कि 2021 के विधानसभा चुनावों में, भाजपा के आक्रामक प्रचार के बावजूद, तृणमूल ने इन क्षेत्रों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी थी और 142 में से 123 सीटों पर जीत हासिल की थी। भाजपा ने हालांकि पूरे बंगाल में 77 सीटें हासिल की थीं, जो राज्य में अब तक की उसकी सबसे अधिक सीटें हैं, लेकिन इस क्षेत्र में भगवा खेमा केवल 18 सीटें सुरक्षित करने में सफल रहा, जिससे इस बार श्री मोदी और उनकी ब्रिगेड के लिए यह सबसे कठिन लड़ाइयों में से एक बन गई है। भाजपा के लिए कठिनाई अंकगणित और जनसांख्यिकी दोनों में निहित है। पिछले कुछ वर्षों में, पार्टी मतुआ और शरणार्थी आबादी के बीच, विशेष रूप से नदिया और उत्तर 24 परगना में, अपना समर्थन मजबूत करने में सफल रही थी, लेकिन हाल के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के कारण शरणार्थी मतदाताओं के एक वर्ग के चुनावी सूची से बाहर होने से इन वर्गों में बेचैनी पैदा हुई है, जो भाजपा के लिए गंभीर चुनौती पेश कर रही है।
इस चरण के महत्व को पहचानते हुए, श्री मोदी ने केवल चार दिनों में छह रैलियां और दो रोड शो करके एक गहन प्रचार अभियान चलाया है, जिसमें दो मतुआ बहुल कृष्णानगर और बनगांव इलाके भी शामिल हैं। प्रधानमंत्री के साथ, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन जैसे हाई-प्रोफाइल नेताओं ने धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए लोगों को नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के माध्यम से नागरिकता अधिकार देने का लगातार वादा किया है, हालांकि यह देखना बाकी है कि पार्टी तृणमूल के इस गढ़ में कितनी सेंध लगा पाती है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए भी दांव उतने ही अहम हैं, क्योंकि इस चरण में कुछ हाई-प्रोफाइल निर्वाचन क्षेत्र दांव पर हैं, जिनमें सबसे उल्लेखनीय भवानीपुर है, जहाँ सुश्री बनर्जी का नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी के साथ सीधा मुकाबला है। एसआईआर प्रक्रिया के बाद लगभग 51,000 मतदाताओं (लगभग 21 प्रतिशत) के नाम हटने के बाद इस सीट ने अतिरिक्त ध्यान आकर्षित किया है, जो संभावित रूप से चुनावी समीकरणों को बदल सकता है। भवानीपुर के अलावा, कई प्रमुख नेता मैदान में हैं, जिनमें फिरहाद हकीम (कोलकाता पोर्ट), चंद्रिमा भट्टाचार्य (दमदम उत्तर), शशि पांजा (श्यामपुकुर), अरूप विश्वास (टॉलीगंज), ब्रात्य बसु (दमदम) और सुजीत बसु (बिधाननगर) शामिल हैं।
भाजपा ने अपनी ओर से स्वपन दासगुप्ता और रूपा गांगुली जैसे चर्चित चेहरों को मैदान में उतारा है और पानीहाटी से आरजी कर अस्पताल की पीड़िता की मां को नामांकित करके भावनात्मक मुद्दों का लाभ उठाने का प्रयास किया है। दोनों दल पहले चरण के भारी मतदान की व्याख्या अपने लाभ के लिए कर रहे हैं। जहाँ श्री मोदी ने दावा किया है कि मतदान 'परिवर्तन की लहर' को दर्शाता है, वहीं अभिषेक बनर्जी सहित तृणमूल नेतृत्व ने दावा किया है कि यह सत्तारूढ़ दल के लिए मजबूत समर्थन और एनआरसी तथा नागरिकता के इर्द-गिर्द भाजपा के खिलाफ प्रतिरोध का संकेत देता है। भाजपा के लिए, यह एक परीक्षा है कि क्या उसका आक्रामक प्रचार और लक्षित पहुँच उस क्षेत्र में महत्वपूर्ण लाभ में बदल सकती है जहाँ उसने ऐतिहासिक रूप से संघर्ष किया है। तृणमूल के लिए, यह अपने किले की रक्षा करने और अपने पारंपरिक प्रभुत्व को एक नए जनादेश में बदलने के बारे में है। 142 सीटों के दांव पर होने के साथ, इस चरण का परिणाम पश्चिम बंगाल में अंतिम चुनावी फैसले को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकता है।
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