संवैधानिक वैधता का मतलब वांछनीयता नहीं है : पूर्व प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना
नई दिल्ली, रविवार, 18 अगस्त 2025। भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना ने एक साथ चुनाव कराने संबंधी विधेयक की समीक्षा कर रही संसदीय समिति से कहा है कि किसी प्रस्ताव की संवैधानिक वैधता यह नहीं दर्शाती कि उसके प्रावधान वांछनीय या आवश्यक भी हैं। सूत्रों ने यह जानकारी दी। न्यायमूर्ति खन्ना ने स्पष्ट किया कि किसी प्रस्ताव को संविधान के अनुरूप मान लेने का यह अर्थ नहीं है कि वह समाज या लोकतंत्र के लिहाज से उचित या जरूरी भी है। सूत्रों के मुताबिक, हालांकि समिति को दिए अपने लिखित मत में न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा कि संविधान संशोधन विधेयक के बारे में देश के संघीय ढांचे को कमजोर करने संबंधी तर्क उठाए जा सकते हैं। उन्होंने इस अवधारणा के समर्थन और आलोचना में किए गए विभिन्न दावों को सूचीबद्ध भी किया।
भाजपा सांसद पी पी चौधरी की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति के साथ अपने विचार साझा करने वाले अधिकांश विशेषज्ञों ने इस आरोप को खारिज कर दिया कि प्रस्ताव असंवैधानिक हैं, लेकिन उन्होंने विधेयक के वर्तमान प्रावधानों के साथ कुछ मुद्दों को उठाया है। न्यायमूर्ति खन्ना संसदीय समिति के साथ मंगलवार को बातचीत करने वाले हैं। न्यायमूर्ति खन्ना भारत के कुछ अन्य पूर्व मुख्य न्यायाधीशों के साथ मिलकर विधेयक में निर्वाचन आयोग को दी गई शक्तियों की सीमा पर चिंता जता रहे हैं।
उन्होंने संसद की समिति को बताया कि प्रस्तावित विधेयक निर्वाचन आयोग को यह तय करने के मामले में 'असीमित विवेकाधिकार' देता है कि किसी राज्य विधानसभा का चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ नहीं कराया जा सकता। साथ ही, इस संबंध में राष्ट्रपति को सिफारिश करने का अधिकार भी आयोग को दिया गया है। न्यायमूर्ति खन्ना ने यह संकेत दिया कि इस प्रकार का असीमित अधिकार किसी एक संस्था को देना संतुलित लोकतांत्रिक प्रक्रिया के दृष्टिकोण से चिंताजनक हो सकता है।
पूर्व प्रधान न्यायाधीश ने समिति से कहा, ‘‘यह खंड मनमाना होने और संविधान के अनुच्छेद-14 का उल्लंघन करने के आधार पर संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करने तथा उस पर हमला करने के कारण प्रश्नगत होगा। ’’ संविधान का अनुच्छेद-14 कानून के समक्ष समानता से संबंधित है। पूर्व प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना ने संसद की समिति को आगाह किया कि यदि निर्वाचन आयोग किसी राज्य में चुनाव स्थगित करता है, तो इसका परिणाम अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति शासन के रूप में हो सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो इससे केंद्र सरकार राज्य सरकार के कार्यों का नियंत्रण संभाल सकती है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति न्यायिक दृष्टि से सवालों के घेरे में आ सकती है, क्योंकि यह संविधान द्वारा कल्पित संघीय ढांचे का उल्लंघन मानी जा सकती है।
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