न्यायालय ने यासीन मलिक को भौतिक रूप से पेश होने की अनुमति नहीं दी

नई दिल्ली, शुक्रवार, 04 अप्रैल 2025। उच्चतम न्यायालय ने जेल में बंद ‘जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट’ (जेकेएलएफ) के प्रमुख यासीन मलिक को जम्मू की एक अदालत में भौतिक रूप से पेश होने की अनुमति नहीं दी लेकिन उसे कुछ मामलों में गवाहों से डिजिटल माध्यम से जिरह करने की इजाजत दे दी। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्ल भुइयां की पीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 303 और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत दिसंबर 2024 के केंद्र के आदेश पर गौर किया जिसमें एक साल के लिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली से उसकी आवाजाही पर प्रतिबंध लगाया गया था।
पीठ ने इस निषेधाज्ञा के मद्देनजर मलिक की भौतिक उपस्थिति को अनुचित पाया। मलिक और अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ दो मुकदमे जम्मू-कश्मीर से दिल्ली स्थानांतरित करने के अनुरोध संबंधी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की याचिका पर यह फैसला सुनाया गया। इनमें से एक मामला आठ दिसंबर 1989 को तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण से जुड़ा हुआ है और दूसरा मामला 25 जनवरी 1990 को श्रीनगर में गोलीबारी में चार भारतीय वायुसेना कर्मियों की हत्या से संबंधित है। सीबीआई ने जम्मू की एक निचली अदालत के 20 सितंबर, 2022 के उस आदेश को भी चुनौती दी है जिसमें आजीवन कारावास की सजा काट रहे मलिक को अपहरण मामले में अभियोजन पक्ष के गवाहों से जिरह करने के लिए अदालत के समक्ष भौतिक रूप से पेश करने का निर्देश दिया गया था।
सीबीआई ने कहा कि मलिक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है और उसे तिहाड़ जेल परिसर से बाहर ले जाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। शीर्ष अदालत ने दिल्ली उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार (आईटी) और जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा क्रमशः तिहाड़ जेल और जम्मू में वीडियो-कॉन्फ्रेंस की सुविधाओं की उपलब्धता को लेकर दायर की गई रिपोर्ट पर भी गौर किया। शीर्ष अदालत ने कहा कि जम्मू सत्र अदालत में वीडियो-कॉन्फ्रेंस की पूरी व्यवस्था है। न्यायालय ने मलिक के इस अभ्यावेदन पर गौर किया कि वह गवाहों से जिरह के लिए वकील की सेवाएं नहीं लेना चाहता।
शीर्ष अदालत ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 530 कहती है कि समन एवं वारंट जारी करने, उन्हें देने और उन्हें लागू करने सहित सुनवाई, पूछताछ और कार्यवाही इलेक्ट्रॉनिक संचार या दृश्य-श्रव्य माध्यमों का उपयोग करके ‘इलेक्ट्रॉनिक मोड’ से की सकती हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मलिक सुरक्षा के लिए जोखिम है और उसे जम्मू अदालत में भौतिक रूप से नहीं ले जाया जा सकता। शीर्ष अदालत ने पहले मलिक और अन्य के खिलाफ दो मामलों की सुनवाई करते समय जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को जम्मू विशेष अदालत में ‘वीडियो-कॉन्फ्रेंस’ के लिए पर्याप्त सुविधाएं सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था।
शीर्ष अदालत ने छह आरोपियों को मामलों की सुनवाई स्थानांतरित करने की सीबीआई की याचिका पर जवाब देने के लिए पिछले साल 18 दिसंबर को दो सप्ताह का समय दिया था। रुबैया को उनके अपहरण के पांच दिन बाद छोड़ा गया था और उस समय भारतीय जनता पार्टी समर्थित तत्कालीन वी पी सिंह सरकार ने बदले में पांच आतंकवादियों को रिहा किया था। रुबैया अब तमिलनाडु में रहती हैं। वह सीबीआई के लिए अभियोजन पक्ष की गवाह हैं। सीबीआई ने 1990 के दशक की शुरुआत में इस मामले को अपने हाथ में लिया था। राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) की विशेष अदालत द्वारा मई, 2023 में आतंकवाद के वित्त पोषण संबंधी मामले में सजा सुनाए जाने के बाद से मलिक तिहाड़ जेल में बंद है।


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