जल संरक्षण का चैप्टर स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए शिक्षा विभाग को भेजा जाएगा प्रस्ताव– जलदाय मंत्री

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जयपुर, बुधवार, 17 मई 2023। जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी मंत्री डॉ. महेश जोशी ने कहा कि जल संरक्षण के प्रति कम उम्र से ही बच्चों में जागरूकता पैदा के लिए जल संरक्षण का चैप्टर स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पीएचईडी एवं भूजल विभाग द्वारा जल संरक्षण एवं जल के बेहतर प्रबंधन से संबंधित पाठ्य सामग्री तैयार कर स्कूल शिक्षा विभाग को प्रस्ताव भेजा जाएगा।  डॉ. जोशी बुधवार को होटल मेरियट में कन्वर्जेंट प्लानिंग एंड इम्प्लीमेंटेशन फॉर सोर्स सस्टेनिबिलिटी इन राजस्थान विषय पर आयोजित स्टेट कंसल्टेशन कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे।

जलदाय मंत्री ने कहा कि जल की बचत ही जल का उत्पादन है, जल है तो कल है, जल ही जीवन है यह साधारण स्लोगन नहीं बल्कि सारगर्भित कथन हैं। इन्हें आमजन तक पहुंचाकर उन्हें भविष्य के लिए पानी बचाने की मुहिम में उनकी भागीदारी बढ़ानी होगी। डॉ. जोशी ने कहा कि पानी की कीमत और उसका बेहतर प्रबंधन जैसलमेर एवं बाड़मेर जैसे रेगिस्तानी इलाके की ढाणियों में रहने वाले ग्रामीणों से अधिक कोई नहीं जान सकता। वहां बूंद-बूंद पानी को सहेजकर कम से कम पानी में गुजारा किया जाता है जबकि शहरों में रहने वाले पढ़े-लिखे लोग पानी का उपयोग सही तरीके से नहीं कर पाते हैं। जितना बड़ा शहर होता है पानी की उतनी ही अधिक खपत होती है। पानी का महत्व शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को समझना होगा।

विषम परिस्थितियों में हमने जल जीवन मिशन में किया अच्छा कार्य

जलदाय मंत्री ने कहा कि प्रदेश की विपरित भौगोलिक परिस्थितियों के बाद भी जल जीवन मिशन (जेजेएम) में राजस्थान ने बहुत सराहनीय कार्य किया है। छितराई बसावट, रेगिस्तान व पहाड़ी इलाका होने के कारण राजस्थान में प्रति जल कनेक्शन लागत 70 हजार रूपए आ रही है जबकि देश के किसी राज्य में जल कनेक्शन पर इतना व्यय नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि जेजेएम की प्रगति दर्शाने के लिए बनाए गए पैरामीटर हर राज्य की परिस्थितियों के अनुसार फिट नहीं हैं। विषम परिस्थितियों के बावजूद राजस्थान ने 40 लाख 68 हजार कनेक्शन कर लिए हैं। मार्च 2023 में कुल एफएचटीसी करने में राजस्थान पूरे देश में दूसरे स्थान पर रहा है।

रिचार्ज स्ट्रक्चर बनने के बाद सूखे कुओं में आया पानी

निदेशक, वाटरशेड श्रीमती रश्मि गुप्ता ने कहा कि पेयजल योजनाओं की निरंतरता भूजल पुनर्भरण पर निर्भर है। उन्होंने बताया कि वाटरशेड विभाग द्वारा किये जा रहे कार्यों का सोर्स सस्टेनिबिलिटी से सीधा संबंध है। विभाग द्वारा पिछले सात साल में 15 हजार गांवों में 3 लाख जल संग्रहण से संबंधित कार्य किए गए हैं। उन्होंने बताया कि जवाजा ग्राम में वर्षों से सूखे कुओं के ऊपरी क्षेत्र में एमपीटी बनाने के बाद उनमें फिर से पानी आने लगा है। उन्होंने समस्त पेयजल स्त्रोतों को राजधारा पोर्टल पर एप्लीकेशन बनाकर जियो टैग करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि कुओं, हैण्डपंप, ट्यूबवैल आदि की लोकेशन देखकर उनके आसपास रिचार्ज स्ट्रक्चर बनाए जाएं ताकि सोर्स सस्टेनिबिलिटी हो सके।

यूनिसेफ की स्टेट हेड इजाबेल बार्डेल ने कहा कि राज्य में 60 प्रतिशत पेयजल जरूरतें भूजल से पूरी होती हैं लेकिन यहां भूजल की स्थिति चिंताजनक है। भूजल पुनर्भरण के मुकाबले दोहन 151 प्रतिशत है। उन्होंने बाड़मेर का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां बनाए गए पानी की कम खपत वाले टॉयलेट्स से सालाना 80 हजार लीटर पानी की बचत हो रही है। उन्होंने ऐसे ही नवाचार करने एवं सोर्स सस्टेनिबिलिटी बढ़ाने के लिए विभिन्न विभागों के समन्वित प्रयासों पर जोर दिया। 

कार्यक्रम की शुरूआत जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी मंत्री डॉ. महेश जोशी एवं अन्य अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर की। अतिरिक्त मुख्य अभियंता (सपोर्ट एक्टीविटीज) श्री सतीश जैन ने प्रदेश में पेयजल की स्थिति पर विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की।  कार्यक्रम में मुख्य अभियंता जल जीवन मिशन श्री आर के मीणा, मुख्य अभियंता (तकनीकी) श्री दलीप गौड़, मुख्य अभियंता (प्रशासन) श्री राकेश लुहाडिया सहित अतिरिक्त मुख्य अभियंता, अधीक्षण अभियंता आदि उपस्थित थे। 

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