वक्फ (संशोधन) अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई 21 जनवरी तक टली

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नई दिल्ली, मंगलवार, 04 नवम्बर 2026। उच्चतम न्यायालय ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई अगले साल 21 जनवरी तक के लिए टाल दी है। न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी बी वराले की पीठ ने मामले से जुड़े पक्षों को 31 दिसंबर तक अपनी दलीलें पूरी करने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा, ‘‘हम उन आवेदकों को आज से दो सप्ताह के भीतर रिट याचिकाएं दाखिल करने की अनुमति देते हैं, जिन्होंने अंतरिम आवेदन दाखिल किए थे और जिन्हें इसी रूप में स्वीकार करने का निर्देश दिया गया था। इसकी प्रति नोडल वकील को दी जाए, जिन्हें उन फैसलों को संकलित कर शामिल करने का निर्देश दिया गया है जिन पर याचिकाकर्ताओं ने भरोसा जताया है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल लिखित दलीलों पर जवाब देंगे। दलीलें 31 दिसंबर, 2026 तक पूरी कर हो जानी चाहिए।’’

जब यह मामला सुनवाई के लिए आया तो नोडल वकील ने अदालत को बताया कि पहले पांच मुख्य याचिकाओं की पहचान की गई थी, जबकि 135 याचिकाओं को अंतरिम आवेदनों (इंटरलोक्यूटरी एप्लिकेशन) में बदल दिया गया था। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि सभी पक्ष लिखित दलीलें दाखिल कर सकते हैं जिन्हें संकलित किया जाएगा। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 17 अप्रैल, 2025 के आदेश का हवाला दिया, जिसके तहत मामलों की संख्या को असाधारण रूप से बढ़ने से रोकने के लिए केवल पांच मुख्य याचिकाओं पर सुनवाई करने का फैसला किया गया था।

उन्होंने दलील दी कि पहले की व्यवस्था में बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। संसद के दोनों सदनों में तीखी बहस के बाद वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 के पारित होने के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे अपनी मंजूरी दे दी। शीर्ष अदालत ने पिछले साल 15 सितंबर को वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के कुछ प्रमुख प्रावधानों पर रोक लगा दी थी। इनमें यह प्रावधान भी शामिल था कि केवल वही व्यक्ति वक्फ बना सकता है, जो पिछले पांच वर्षों से इस्लाम का पालन कर रहा हो। हालांकि, न्यायालय ने पूरे कानून पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था और इसकी संवैधानिक वैधता की धारणा को रेखांकित किया था।

पक्षों के हितों की रक्षा और उनके बीच संतुलन बनाए रखने के लिए न्यायालय ने कुछ प्रावधानों पर रोक लगाई थी। इनमें वक्फ संपत्ति की स्थिति पर फैसला करने के लिए जिलाधिकारी को दी गई शक्तियां भी शामिल थीं। न्यायालय ने वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की भागीदारी के मुद्दे पर भी निर्देश दिए थे। शीर्ष अदालत ने केंद्रीय वक्फ परिषद में कुल 20 सदस्यों में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या चार से अधिक नहीं रखने का निर्देश दिया था। इसके अलावा, राज्य वक्फ बोर्ड में कुल 11 सदस्यों में ऐसे सदस्यों की संख्या तीन से अधिक नहीं रखने को कहा था।

शीर्ष अदालत ने कहा था, ‘‘संशोधित वक्फ अधिनियम की धारा तीन के खंड (आर) का वह हिस्सा - जिसमें 'कोई भी व्यक्ति जो यह दिखाए या साबित करे कि वह कम से कम पांच वर्षों से इस्लाम का पालन कर रहा है' - तब तक स्थगित रहेगा, जब तक कि राज्य सरकार इस बात का निर्धारण करने के लिए कोई प्रक्रिया या नियम नहीं बना लेती कि कोई व्यक्ति वास्तव में कम से कम पांच वर्षों से इस्लाम का पालन कर रहा है या नहीं।’’ शीर्ष अदालत ने उस प्रावधान पर भी रोक लगा दी थी, जिसमें कहा गया था कि ‘‘नामित अधिकारी की रिपोर्ट आने तक किसी संपत्ति को वक्फ संपत्ति नहीं माना जाएगा।’’

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