यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए ओबीसी क्रीमी लेयर नियमों पर केंद्र की याचिका पर सुनवाई करेगा न्यायालय

img

नई दिल्ली, मंगलवार, 01 सितंबर 2026। उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र की उस याचिका पर विचार करने पर सहमति जताई, जिसमें सिविल सेवा परीक्षा (सीएसई) 2025 के उम्मीदवारों पर ओबीसी क्रीमी-लेयर मानक से जुड़े 11 मार्च के उसके फैसले के लागू होने के बारे में स्पष्टीकरण मांगा गया था। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र की याचिका पर नोटिस जारी किया और सभी पक्षों से 17 सितंबर तक अपना जवाब दाखिल करने को कहा। केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस साल 11 मार्च के फैसले को लागू करने में व्यावहारिक तौर पर गंभीर मुश्किलें हैं, क्योंकि उम्मीदवार अपनी पदस्थापना का इंतजार कर रहे हैं और इससे वे प्रभावित होंगे।

कुछ मूल याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े और पी. विल्सन ने कहा कि केंद्र की ओर से दायर याचिका की विचारणीयता पर उन्हें शुरुआती आपत्ति है। हेगड़े ने कहा कि केंद्र ने फैसले पर स्पष्टीकरण के लिए एक विविध आवेदन दायर किया है और यह कोई पुनर्विचार याचिका नहीं है। मेहता ने कहा कि उनके पक्ष में कई फैसले हैं और अगर विरोधी पक्ष की ओर से मामले की विचारणीयता का मुद्दा उठाया जाता है, तो वे उस पर अपनी बात रख सकते हैं। उच्चतम न्यायालय ने 25 अगस्त को कहा था कि वह 11 मार्च के उसके फैसले के लागू होने के संबंध में स्पष्टीकरण मांगने वाली केंद्र की याचिका पर सुनवाई के लिए एक विशेष पीठ का गठन करेगा। कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने सरकार को सीएसई-2025 के लिए संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा अनुशंसित 958 उम्मीदवारों के सेवा आवंटन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति देने के लिए निर्देश मांगे हैं। यह प्रक्रिया 11 मार्च के फैसले से पहले लागू अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) क्रीमी-लेयर के निर्धारण के आधार पर की जानी है।

डीओपीटी की याचिका शीर्ष अदालत के ‘भारत संघ बनाम रोहित नाथन’ मामले में दिए गए फैसले से जुड़ी है। इस मामले में अदालत ने 11 मार्च को दिए अपने फैसले में कहा था कि 14 अक्टूबर 2004 का स्पष्टीकरण पत्र अन्य पिछड़ा वर्ग की क्रीमी लेयर की पहचान से जुड़े आठ सितंबर 1993 के कार्यालय ज्ञापन को दरकिनार नहीं कर सकता। न्यायालय ने यह भी कहा था कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम या निजी क्षेत्र में कार्यरत माता-पिता के वेतन या आय को अकेले क्रीमी लेयर से बाहर रखने का निर्णायक आधार नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा था कि 1993 के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार माता-पिता के पद की स्थिति और श्रेणी के साथ-साथ निर्धारित आय/संपत्ति मानदंड को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

Similar Post

LIFESTYLE

AUTOMOBILES

Recent Articles

Facebook Like

Subscribe

FLICKER IMAGES

Advertisement