कारगिल युद्ध से जुड़ी पूर्व सैन्य अधिकारी की याचिका पर विचार करने से उच्चतम न्यायालय का इनकार
नई दिल्ली, शुक्रवार, 07 फ़रवरी 2025। उच्चतम न्यायालय ने एक पूर्व सैन्य अधिकारी द्वारा दायर जनहित याचिका पर विचार करने से शुक्रवार को इनकार कर दिया, जिसमें उन्होंने 1999 में हुए कारगिल युद्ध से पहले पाकिस्तान की घुसपैठ के संबंध में दी गई सूचना पर कार्रवाई करने में सेना की ओर से लापरवाही बरते जाने का आरोप लगाया गया था। प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने कहा, “न्यायपालिका आमतौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले पर विचार नहीं करती… 1999 के युद्ध में जो हुआ, वह कार्यपालिका के निर्णय से संबंधित आंतरिक मामला है।” पीठ पंचकूला में रहने वाले पूर्व सैन्य अधिकारी मनीष भटनागर द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। भटनागर ने आरोप लगाया था कि उन्होंने कारगिल में हुई घुसपैठ के बारे में आधिकारिक सूचना दिए जाने से काफी पहले गुप्त जानकारी दी थी, हालांकि उनकी दी हुई जानकारी पर कार्रवाई नहीं की गई। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “कुछ चीजें ऐसी हैं, जिनमें न्यायपालिका को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। ऐसा करना गलत होगा।”
न्यायालय के रुख को भांपते हुए, भटनागर ने जनहित याचिका वापस लेने का अनुरोध किया, जो स्वीकार कर लिया गया। पैराशूट रेजिमेंट की 5वीं बटालियन के पूर्व अधिकारी भटनागर ने पहले भी घुसपैठ का पता लगाने और उसके बाद अभियान के संचालन के तरीके के बारे में सवाल उठाए थे। उन्होंने पहले आरोप लगाया था कि कारगिल घुसपैठ के बारे में उन्होंने जनवरी-फरवरी 1999 में ही अपने वरिष्ठ सैन्यकर्मियों को जानकारी भेज दी थी, लेकिन उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। भटनागर ने कहा था कि जब बड़े पैमाने पर संघर्ष छिड़ गया, तो उन्हें किसी दूसरे बहाने से ‘कोर्ट मार्शल’ करके सेना छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। कारगिल युद्ध मई से जुलाई 1999 तक चला था।
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