लोक पर्व हरेला

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उत्तराखंड में ऋतुओं के अनुसार अनेक पर्व मनाए जाते हैं। इन्हीं पर्वो में हरियाली का प्रतीक हरेला पर्व भी मुख्य रूप से सम्मिलित है जो इस पर्वतीय राज्य में एक लोकपर्व के तौर पर मनाया जाता है। हरेला पर्व हरियाली यानी पर्यावरण से जुड़ा हुआ है जो समृद्धि का प्रतीक है और कृषि प्रधान देश भारत की कृषि संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। हरेला पर्व कुमाऊं क्षेत्र में धूमधाम से मनाया जाता है और जनमानस के मन में रचा-बसा है। हरेला पर्व के साथ कुमाऊं में श्रावण मास की शुरुआत होती है। कुछ स्थानों पर प्रकृति संरक्षण के रूप में भी हरेला मनाए जाने का प्रचलन है। आषाढ़ माह की कर्क की संक्रांति के अवसर पर मनाया जाने वाला यह त्योहारसंसार को प्रकृति के संरक्षण का संदेश देता है।

इस अवसर पर गौरी और महेश्वर की परिवार सहित पूरे विधि-विधान से पूजा अर्चना की जाती है। कर्क की सक्रांति से नौ दिन पहले हरेला घर के पूजा घर में बोया जाता है और दसवें दिन इसे पूजा अर्चना के साथ विधि विधान से काटा जाता है। शास्त्रों के अनुसार कर्क की सक्रांति से नौ दिन पहले यदि अमावस्या पड़ती है तो हरेला अमावस्या से एक दिन पहले बोने का विधान है। हरेला पूजा घर में मिट्टी के पात्र या पीतल या किसी धातु के पात्र में मिट्टी और रेत के मिश्रण में बोया जाता है जिसमें पांच, सात या नौ तरह के अनाज दाल जैसे गेहूं ,धान, जो, चना ,राजमा, भट्ट, गहत, मूंग, साबूत, उड़द मक्का आदि बोए जाते हैं। मान्यता है कि हरेला जितना अधिक अच्छा होगा, उतनी ही फसल अच्छी होगी यह कृषि कीसमृद्धि का प्रतीक है इसलिए भगवान से हरेले की पूजा की पूजा के समय अच्छी फसल की प्रार्थना की जाती है।

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