शाहजहांपुर में शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ 'लाट साहब' का जुलूस
शाहजहांपुर (उप्र), बुधवार, 04 मार्च 2026। उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में होली पर निकलने वाला 'लाट साहब' का जुलूस इस बार कड़ी सुरक्षा के बीच शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो गया। एक अजीबोगरीब परंपरा के तहत निकाले जाने वाले इस जुलूस के दौरान हुरियारे 'लाट साहब की जय' बोलते हुए उन्हें जूतो से मार रहे थे। हालांकि लाट साहब पुलिस तथा पीएसी के सुरक्षा घेरे में रहे। पुलिस सूत्रों ने बुधवार को बताया कि लाट साहब का जुलूस परंपरागत तरीके से फूलमती देवी मंदिर से शुरू हुआ। उन्होंने बताया कि इस दौरान परंपरा के अनुसार लाट साहब ने मंदिर में माथा टेका और उसके बाद यह जुलूस कोतवाली पहुंचा जहां कोतवाल ने लाट साहब को 'सलामी' दी।
उन्होंने बताया कि बाद में परंपरा के अनुसार लाट साहब ने कोतवाल से पूरे साल हुए अपराधों का ब्यौरा मांगा और इससे 'बचने' के लिए कोतवाल ने लाट साहब को नगद धनराशि तथा शराब की बोतल दी। सूत्रों ने बताया कि जुलूस के पूरे रास्ते भर हुरियारे लाट साहब के जयकारे लगाते हुए उन्हें जूते मारते रहे। बाद में यह जुलूस चार खंबा होते हुए टाउन हॉल होते हुए आठ किलोमीटर के दायरे में घूम कर फिर फूलमती मंदिर पर पहुंचकर सम्पन्न हो गया। सूत्रों ने बताया कि इसी तरह छोटे लाल साहब का जुलूस भी शांति एवं सौहार्द के वातावरण में संपन्न हो गया है।
लाट साहब के जुलूस के आयोजक मंडल के एक सदस्य ने बताया कि जुलूस मार्ग पर नगर निगम द्वारा डामर की एक पट्टी डाले जाने से लोगों को खासी दिक्कत का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि नगर आयुक्त विपिन कुमार मिश्रा से इस बारे में बात करने की कोशिश की गई लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी। सदस्य ने बताया कि जुलूस में बैलगाड़ी पर तख्त डालकर और उस पर कुर्सी रखकर लाट साहब का आसन बनाया गया। इस दौरान लाट साहब के सिर पर हेलमेट भी लगाया गया था और पीएसी तथा पुलिस के जवान उनके चारों तरफ सुरक्षा घेरा बनाये रहे।
जिलाधिकारी धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने बुधवार को बताया की जुलूस मार्ग में पढ़ने वाली 48 मस्जिद तथा मजारों को मोटी प्लास्टिक की चादर से पूरी तरह ढक दिया गया था। उन्होंने बताया कि साथ ही जुलूस के मार्ग पर निकलने वाली 148 गलियों को अवरुद्ध करके उनमें बैरीकेडिंग की गई जिससे जुलूस में एकाएक भीड़ न उमड़े।
उन्होंने कहा कि बड़े लाट साहब तथा शहर के विभिन्न हिस्सों में निकाले जाने वाले 'छोटे लाट साहब' के जुलूसों के मार्गों को सात जोन में बांटा गया था और एक जोन में सेक्टर तथा उप सेक्टर बनाए गए थे जिसमें जोनल सेक्टर तथा उप सेक्टर एवं स्टेटिक मजिस्ट्रेट 136 तैनात किये गये थे। पुलिस अधीक्षक (एसपी) राजेश द्विवेदी ने बताया कि इस बार लाट साहब के जुलूस में चार अपर पुलिस अधीक्षक, 13 पुलिस क्षेत्राधिकारी, 310 दारोगा, 1200 सिपाही तथा 500 होमगार्ड्स जवानों के अलावा चार कंपनी पीएसी तथा रैपिड एक्शन फोर्स की चार कंपनियों के अलावा एनडीआरएफ (राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल) की टीम की भी तैनाती की गई थी।
एसपी ने कहा कि पिछली बार जुलूस के दौरान छुटपुट घटना हुई थी इसलिए इस बार जुलूस में एक और जोन बढ़ा दिया है तथा एक महीने से प्रत्येक थाने और चौकी पर सभी धर्म के लोगों के साथ शांति समितियों की बैठकें की और लोगों से होली का पर्व शांति एवं सद्भाव के साथ मनाने की अपील की गई थी। स्वामी शुकदेवानंद कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉक्टर विकास खुराना के अनुसार यह परंपरा बेहद रोचक है। उन्होंने बताया, ''शाहजहांपुर में रहने वाले नवाब अब्दुल्ला खान अपने परिवार से नाराज होकर फर्रुखाबाद चले गए थे और 1728 में जब लौटे तो संयोग से उस दिन होली थी। तब हिंदू-मुस्लिम समुदाय ने उनके साथ होली खेली और शहर का चक्कर लगाया, तभी से यह परंपरा शुरू हुई।''
उन्होंने बताया कि साल 1859 में अंग्रेजों ने शाहजहांपुर पर फिर से कब्जा कर लिया और उसके बाद जिला प्रशासन स्वयं नवाब साहब के जुलूस का आयोजन करने लगा, लेकिन 1988 में तत्कालीन जिलाधिकारी कपिल देव ने इसका नाम 'लाट साहब का जुलूस' कर दिया।'' खुराना ने बताया, ''समय के साथ जुलूस का स्वरूप बदलता गया और 'लाट साहब' को जूते-चप्पलों से मारने की परंपरा शुरू हो गई। उन्होंने बताया कि 1990 में रामनाथ बघेल ने जुलूस रोकने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, लेकिन अदालत ने इसे पुरानी परंपरा मानते हुए हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था।
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