अगर आप भी पाना चाहते है शनि के प्रकोप से मुक्ति तो जरूर करें दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ

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जब किसी मनुष्य पर शनि की साढ़ेसाती, ढैया तथा अन्य महादशा चल रही होती है तो उसे शारीरिक, मानसिक तथा आर्थिक तीनों प्रकार से प्रताड़ना सहनी पड़ती है। यदि आप शनिदेव के प्रभाव से बचना चाहते हैं तो प्रत्येक शनिवार के दिन दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ अवश्य करें। ऐसा करने से शनिदेव खुश होते हैं तथा साढ़ेसाती, ढैया आदि किसी भी प्रकार की शनि संबन्धी पीड़ा से छुटकारा देते हैं। 

ये है मान्यता:-
कहा जाता है कि शनि स्तोत्र के रचियता राजा दशरथ हैं। उन्होंने ही इस स्तुति से शनिदेव को खुश किया था। तब शनिदेव ने उनसे वर मांगने को कहा था। तत्पश्चात, राजा दशरथ ने शनिदेव से प्रार्थना की कि वे देवता, असुर, मनुष्य, पशु-पक्षी किसी को भी पीड़ा न दिया करें। उनकी बात सुनकर शनिदेव बहुत खुश हुए और कहा कि आज के पश्चात् जो भी इस दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करेगा, उसे शनि के प्रकोप से छुटकारा प्राप्त हो जाएगा।

ये है शनि स्तोत्र:-

नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च
नमः कालाग्निरुपाय कृतान्ताय च वै नमः

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते

नमः पुष्कलगात्राय स्थुलरोम्णेऽथ वै नमः
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नमः
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च

अधोदृष्टेः नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तु ते

तपसा दग्ध।देहाय नित्यं योगरताय च
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नमः

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज।सूनवे
तुष्टो ददासि वै राज्यं रूष्टो हरसि तत्क्षणात्

देवासुरमनुष्याश्र्च सिद्ध।विद्याधरोरगाः
त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः

प्रसाद कुरु मे सौरे! वारदो भव भास्करे
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबलः

इस प्रकार करें शनि स्तोत्र:
शनिवार को प्रातः शीघ्र उठकर या शाम को इसका पाठ किया जा सकता है। पूजन से पहले स्नानादि करके स्वच्छ कपड़े पहनें। शनिदेव के समक्ष सरसों के तेल का दीया जलाएं। इसके पश्चात् उन्हें सच्चे दिल से नमन करके दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करें तथा संकटों से मुक्ति की प्रार्थना करें। पूजा के पश्चात् शनि देव के मंदिर में जाकर तिल का तेल या सरसों के तेल में काले तिल डालकर अर्पित करें। अगर संभव हो तो किसी जरूरतमंद को सामर्थ्य के मुताबिक दान करें।

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