महंगाई दर बढ़ने की आशंका

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मुंबई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ना भारत के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है। इसके कारण महंगाई बढ़ सकती है, जो नीतिगत ब्याज दरों में और कटौती की उम्मीदों पर पानी फेर सकता है। मोटे तौर पर अब तक भारत में महंगाई दर रिजर्व बैंक के टारगेट के दायरे में है। यही वजह रही कि आरबीआई ने 2019 में अब तक दूसरी बार रेपो रेट में कटौती की। लेकिन, इस मामले में आगे भी उसका यही रुख रहेगा, इस पर संदेह के बादल मंडराने लगे हैं।

चूंकि कच्चे तेल की कीमतें पिछले पांच महीनों के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं, लिहाजा निवेशकों के बीच इस बात को लेकर इत्मीनान कम होता जा रहा है कि रिजर्व बैंक मौद्रिक नीतियों के मामले में नरम रुख जारी रखेगा। हालांकि उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। आर्थिक विकास की रफ्तार सुस्त पड़ने और अब तक महंगाई करीब-करीब नियंत्रण में रहने की वजह से रेपो रेट में कटौती की गुंजाइश बनी हुई है। फरवरी तक खुदरा कीमतों के हिसाब से महंगाई दर कम रहने के कारण आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास और मौद्रिक नीति समिति पहले फरवरी में और फिर अप्रैल में रेपो रेट 0.25-0.25 प्रतिशत घटा पाई, ताकि अर्थव्यवस्था को सपोर्ट मिल सके। कुल मिलाकर इस साल अब तक रेपो रेट में 0.50 प्रतिशत की बड़ी कटौती हो चुकी है।

चूंकि देश में खाने-पीने की ज्यादातर चीजें अब भी सस्ती हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के बावजूद घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के दाम नहीं बढ़े हैं, लिहाजा कुछ अर्थशास्त्री अब भी रेपो रेट में कटौती की गुंजाइश देख रहे हैं। फरवरी में खुदरा कीमतों के हिसाब से महंगाई दर 2.5 प्रतिशत थी।

क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी ने कहा, 'कच्चे तेल में हाल की तेजी यदि बनी रहती है, तो यह आर्थिक वृद्घि और महंगाई को लेकर संभावनाएं, दोनों के लिए चुनौती साबित होगी।' उत्पादन में कटौती के कारण कच्चे तेल के बेंचमार्क ब्रेंट कू्रड की कीमत तेजी से बढ़ी है। आरबीआई को लगता है कि यदि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार को लेकर तनाव कम या खत्म होता है, तो ऐसी स्थिति में कच्चे तेल की कीमतें आगे भी बढ़ेंगी। फिलहाल दोनों पक्ष बातचीत की मेज पर हैं और उम्मीद जताई जा रही है कि नतीजे सकारात्मक आएंगे।

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