'महात्मा गांधी हत्याकांड' की जांच दोबारा नहीं होगी: सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने महात्मा गांधी के हत्याकांड की दोबारा जांच पर बड़ा फैसला सुनाया। वकील अमरेंद्र शरण ने कोर्ट के आदेश पर गांधी हत्याकांड से जुड़े सभी जरूरी कागजातों की जांच की जिसमें उन्होंने बताया कि बापू की हत्या करने में नाथूराम गोडसे के अलावा किसी और के होने के सबूत नहीं मिले हैं। इस पर कोर्ट ने अब देश के इस बड़े हत्याकांड की जांच दोबारा नहीं करने का फैसला सुनाया। शरण ने यह भी जानकारी दी कि जिस फोर बुलेट थ्योरी की बात होती है उसका भी कोई सबूत नहीं है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व अडिशनल सलिसिटर जनरल अमरेंद्र शरण को सलाहकार (एमिकस क्यूरी) नियुक्त किया था। जस्टिस एस. ए. बोबडे और जस्टिस एल. नागेश्वर राव की कोर्ट की बेंच ने 7 अक्तूबर, 2017 को सरन को एमिकस क्यूरी नियुक्त करते हुए उन्हें निर्देश दिया था कि वह गांधी हत्याकांड से जुड़े दस्तावेजों की जांच करें।

गोडसे के अलावा किसी और ने नहीं चलाई गोली
उल्लेखनीय है कि पंकज फडनीस की एक थ्योरी थी कि गांधी की हत्या चार गोलियां मार कर हुई थी। इस याचिका में गांधी हत्याकांड में ‘तीन बुलेट की कहानी’ पर प्रश्न चिह्न लगाने के साथ यह सवाल भी उठाया गया था कि क्या नाथूराम गोडसे के अलावा किसी अन्य व्यक्ति ने चौथी बुलेट भी दागी थी? उन्होंने दावा किया था कि महात्मा गांधी की हत्या एक रहस्यमय शख्स ने की थी। रहस्यमय शख्स ने 'चौथी गोली' चलाई थी और जिसे कभी पकड़ा नहीं गया। पंकज की इस याचिका के बाद ही कोर्ट ने सबूतों की जांच की जिम्मेदारी सरन को सौंपी थी।

इस मामले में अब शरण ने अंतिम रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में सौंप दी है। वकील शरण ने बापू के उन कपड़ों की भी जांच की थी जिन्हें उन्होंने आखिरी बार पहना था। उन कपड़ों की जांच के बाद वरिष्ठ वकील ने कोर्ट में कहा कि बापू के खून के धब्बे लगे कपड़ों को देखना बहुत विचलित करने वाला अनुभव था।

उर्दू में दर्ज की गई थी एफआईआर
30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला हाऊस में महात्मा गांधी की हत्या हुई थी। हत्या की एफआईआर उसी दिन यानी 30 जनवरी को दिल्ली के तुगलक रोड थाने में दर्ज की गई थी। एफआईआर उर्दू में लिखी गई थी जिसमें पूरी वारदात के बारे में बताया गया था। दिल्ली के तुगलक रोड के रिकॉर्ड रूम में आज भी वो एफआईआर संभाल कर रखी गई है, एफआईआर को बाकायदा लेमिनेशन करवा कर रखा गया है, अगर कभी भी बापू की हत्या का मामला फिर से खुलता है और जांच नए सिरे से शुरू होती है तो इसी एफआईआर के आधार पर जांच शुरू की जाएगी। वहीं बापू हत्या के दिन पहने गए कपड़ों को सुरक्षित रखा गया है।

इस हत्याकांड में अदालत ने 10 फरवरी, 1949 को गोडसे और आप्टे को मौत की सजा सुनाई थी। विनायक दामोदर सावरकर को साक्ष्यों की कमी के कारण छोड़ दिया गया था। पूर्वी पंजाब हाईकोर्ट द्वारा 21 जून, 1949 को गोडसे और आप्टे की मौत की सजा की पुष्टि के बाद दोनों को 15 नवंबर, 1949 को अंबाला जेल में फांसी दे दी गई थी।

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