1 रुपये के नोट ने 100 साल का सफर किया पूरा

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नई दिल्ली: आपने बुजुर्गों के मुंह से अक्सर ये बात सुनी भी होंगी कि 'बात 16 आना सच' है. यानी पहले सच्चाई और शुद्धता का पैमाना पैसे हुआ करते थे. ये 16 आना ही आगे चलकर 1 रुपया बना. यानी एक रुपये में 16 आना हुआ करते थे. बाद में 1 रुपये का यह सफर 100 पैसे तक जा पहुंचा. लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही 1 रुपया का नोट 100 साल का हो चुका है और इसकी शुरुआत का इतिहास भी बड़ा दिलचस्प है. पहले आना (Anna) चला करते थे और एक रुपये में 16 आना हुआ करते थे, जो बाद में एक रुपये में 100 नए पैसे की गिनती होने लगी.  इसे 'टका' भी कहा जाता है.

हुआ यूं कि दौर था पहले विश्वयुद्ध का और देश में हुकूमत थी अंग्रेजों की. उस दौरान एक रुपये का सिक्का चला करता था जो चांदी का हुआ करता था लेकिन युद्ध के चलते सरकार चांदी का सिक्का ढालने में असमर्थ हो गई और इस प्रकार 1917 में पहली बार एक रुपये का नोट लोगों के सामने आया. इसने उस चांदी के सिक्के का स्थान लिया. ठीक सौ साल पहले 30 नवंबर 1917 को ही यह एक रुपये का नोट सामने आया जिस पर ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम की तस्वीर छपी थी. भारतीय रिजर्व बैंक की वेबसाइट के अनुसार इस नोट की छपाई को पहली बार 1926 में बंद किया गया क्योंकि इसकी लागत अधिक थी. इसके बाद इसे 1940 में फिर से छापना शुरु कर दिया गया जो 1994 तक अनवरत जारी रहा. बाद में इस नोट की छपाई 2015 में फिर शुरु की गई.

One Rupee Note

अंग्रेजी शासन काल में भारतीय मुद्रा पर किंग जार्ज पंचम की तस्वीर हुआ करती थी

इस नोट की सबसे खास बात यह है कि इसे अन्य भारतीय नोटों की तरह भारतीय रिजर्व बैंक जारी नहीं करता बल्कि स्वयं भारत सरकार ही इसकी छपाई करती है. इस पर रिजर्व बैंक के गवर्नर का हस्ताक्षर नहीं होता बल्कि देश के वित्त सचिव का दस्तखत होता है. इतना ही नहीं कानूनी आधार पर यह एक मात्र वास्तविक ‘मुद्रा’ नोट (करेंसी नोट) है बाकी सब नोट धारीय नोट (प्रॉमिसरी नोट) होते हैं जिस पर धारक को उतनी राशि अदा करने का वचन दिया गया होता है.

दादर के एक प्रमुख सिक्का संग्राहक गिरीश वीरा ने बताया, ‘पहले विश्वयुद्ध के दौरान चांदी की कीमतें बहुत बढ़ गईं थी. इसलिए जो पहला नोट छापा गया उस पर एक रुपये के उसी पुराने सिक्के की तस्वीर छपी. तब से यह परंपरा बन गई कि एक रुपये के नोट पर एक रुपये के सिक्के की तस्वीर भी छपी होती है.’ शायद यही कारण है कि कानूनी भाषा में इस रुपये को उस समय ‘सिक्का’ भी कहा जाता था. पहले एक रुपये के नोट पर ब्रिटिश सरकार के तीन वित्त सचिवों के हस्ताक्षर थे. ये नाम एमएमएस गुब्बे, एसी मैकवाटर्स और एच. डेनिंग थे. आजादी से अब तक 18 वित्त सचिवों के हस्ताक्षर वाले एक रुपये के नोट जारी किए गए हैं. वीरा के मुताबिक एक रुपये के नोट की छपाई दो बार रोकी गई और इसके डिजाइन में भी कम से कम तीन बार आमूल-चूल बदलाव हुए लेकिन संग्राहकों के लिए यह अभी भी अमूल्य है.

नामकरण: रुपया शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द रुप् या रुप्याह् से हुई है, जिसका अर्थ कच्ची चांदी होता है और रूप्यकम् का अर्थ चांदी का सिक्का है. "रुपया" शब्द का प्रयोग सबसे पहले शेरशाह सूरी ने भारत में अपने शासन (1540-1545) के दौरान किया था. शेरशाह सूरी ने अपने शासन काल में चांदी का सिक्का चलाया था जिसका वजन 178 ग्रेन (11.534 ग्राम) के लगभग था. उसने तांबे का सिक्का जिसे दाम तथा सोने का सिक्का जिसे मोहर कहा जाता था को भी चलाया. पहले रुपए (11.66 ग्राम) को 16 आने या 64 पैसे या 192 पाई में बांटा जाता था. रुपये का दशमलवीकरण 1869 में सीलोन (श्रीलंका) में, 1957 में भारत मे और 1961 में पाकिस्तान में हुआ. इस प्रकार अब एक भारतीय रुपया 100 पैसे में विभाजित हो गया. 

असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में बोली जाने वाली असमिया और बांग्ला भाषाओं में, रुपये को टका के रूप में जाना जाता है और भारतीय बैंक नोटों पर भी इसी रूप में लिखा जाता है. नया डिजाइन: 2010 में भारतीय सरकार द्वारा एक रुपये के लिए नया प्रतीक चिह्न तय करने के लिए एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता का आयोजन किया गया. जूरी द्वारा सभी प्रविष्टियों में से पांच डिजाइनों को चुना गया, जिनमें से आईआईटी के प्रोफेसर उदय कुमार के डिजाइन को चुना गया.

दाशमिक प्रणाली: पहली बार अमेरिका ने 1792 में अपनी मुद्रा के लिए दाशमिक प्रणाली (मुद्रा को न्यूनतम मूल्य की दस, सौ या एक हजार इकाइयों में विभाजित करना) अपनाई थी. इसके बाद यह प्रणाली इतनी लोकप्रिय हुई कि ब्रिटेन को छोड़कर यूरोप के सभी देशों ने इसे अपना लिया. भारत में तब एक रुपये में 16 आने प्रणाली प्रचलित थी. 1955 में जब संसद ने सिक्का ढलाई संशोधन कानून पारित कर रुपये को सौ भागों में विभाजित करके इसकी न्यूनतम इकाई एक पैसा बना दी गई. 1957 में भारत सरकार ने ‘नए पैसे’ या ‘नया पैसा’ लिखे नए सिक्के जारी कर दिए.

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