वैवाहिक विवादों को सुलझाने के लिए सुलह सहमति प्रक्रिया की जरूरत- हाई कोर्ट

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नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने वैवाहिक मामले सुलझाने के लिए मध्यस्थता की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा है कि दंपतियों के बीच ऐसे मामले सुलझाने के लिए सुलह सहमति प्रक्रिया की जरूरत है. अदालत ने कहा है कि संवैधानिक नियम वैवाहिक विवादों को त्वरित गति से निपटाने और वादियों को तुरंत न्याय दिलाने के लिए हैं लेकिन यहां की अदालतों में बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं, जिसके कारण अदालतें पहले की बोझ से दबी हैं इसलिए इन मामलों को त्वरित गति से निपटाने में मुश्किलें आती हैं. न्यायमूर्ति पी एस तेजी ने कहा,‘‘चूंकि वैवाहिक विवाद मुख्य रूप से पति-पत्नी के बीच होते हैं और इन मामलों में निजी मसले शामिल होते हैं इसलिए दोनों के बीच समझौता कराने में सुलह सहमति प्रक्रिया की जरूरत है.

इन दिनों, विवाद सुलझाने में खास तौर पर वैवाहिक विवादों में मध्यस्थता काफी अहम भूमिका निभाती है,और इसके अच्छे परिणाम भी सामने आए हैं.' अदालत ने साल 2003 में एक महिला द्वारा दर्ज कराई गई शकायत को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की.  प्राथमिकी में महिला ने कहा था कि शादी के दौरान मिले दहेज को लेकर उसके सास-ससुर नाखुश थे और उसका पति उस पर अत्याचार करता था.

अदालत ने इस मामले में पुरुष द्वारा प्राथमिकी खत्म करने की याचिका को यह कहते हुए स्वीकार कर लिया कि उन्होंने आपसी सुलह से मामले को सुलझा लिया है और सभी विवाद हल हो गए हैं. महिला ने भी अदालत से कहा कि अगर प्राथमिकी रद्द होती है तो उसमें उसे कोई आपत्ति नहीं है.

समझौते के अनुसार पुरुष और महिला दोनों आपसी सहमति से तलाक के लिए सहमत हो गए हैं और पुरुष महिला को 4.88 लाख रुपये देगा. अदालत ने कहा कि भारत की अदालतें सामान्य तौर पर यह चाहती हैं कि सुलह सहमति प्रक्रिया को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि विवाह और पारिवारिक विवाद जैसे मामलों का निपटारा त्वरित गति से हो सके. 

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