हिमाचल प्रदेश चुनाव: खेती, किसानी नहीं बन पाया है चुनावी मुद्दा

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शिमला। पर्वतीय क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में खेती करना दुरूह और घाटे का सौदा होने के बावजूद खेती, किसानी आसन्न विधानसभा चुनाव में मुद्दा नहीं बन पाया है। प्रदेश के किसानों के समक्ष सिंचाई सुविधा की कमी, पशुओं के लिये चारा जुटाना और जानवरों के हमले प्रमुख समस्या बनी हुई है। हिमाचल प्रदेश एक पर्वतीय प्रदेश है और यहां खेती करना काफी कठिन कार्य है। 80 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र असिंचित हैं जहां खेती बारिश पर निर्भर है। इसके अलावा भी किसानों को जंगली जानवरों के हमले के खतरों से निपटना पड़ता है। प्रदेश विधानसभा चुनाव में खेती का मुद्दा प्रमुख विषय के रूप में नहीं उभर रहा है। हालांकि भाजपा ने किसान मोर्चा को मजबूत बनाने के लिये सीटों के हिसाब से कैम्प बनाये हैं और कैम्प प्रभारियों के माध्यम से किसान फसल बीमा योजना, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना समेत केंद्र सरकार के किसानोन्मुखी कार्यक्रमों को जमीनी स्तर तक पहुंचाने और कृषि क्षेत्र में प्रदेश सरकार की नाकामियों को उजागर करने पर जोर दिया है।

दूसरी ओर, कांग्रेस छोटी छोटी सभाओं के माध्यम से प्रदेश में किसानों के कल्याण के लिये अपनी सरकार के कार्यो को रेखांकित कर रही है। सोलन के शाधयाल गांव के किसान चेतराम शर्मा ने बताया कि खेती करना अब केवल घाटे का सौदा नहीं रहा बल्कि यह कठिन हो गया है। पहाड़ों पर पानी के स्रोत सूख रहे हैं और सिंचाई का कोई वैकल्पिक साधन नहीं है। खेती बारिश पर निर्भर रह गई है। शोघी गांव के मनोज सूद ने बताया कि सिंचाई के साधन की कमी के साथ हमें जंगली जानवरों के हमलों का लगातार खतरा रहता है। सरकार ने इस बारे में कुछ योजनाएं बनाई है लेकिन इसमें इतनी समस्या है कि हम दफ्तरों के चक्कर लगा कर कुछ दिनों बाद घर में बैठ जाते हैं ।

शोघी गांव के ही दिनेश शर्मा ने बताया कि खेती के अलावा पशुपालन भी कठिन हो गया है। मौसम में काफी बदलाव आ गया है। बारिश ठीक से नहीं हो पाती है। इसके कारण पशुओं के लिये चारा जुटाना समस्या बन गया है। दूसरी ओर, प्रदेश के कृषि मंत्री सुजान सिंह पठानिया ने बातचीत में दावा किया कि कांग्रेस की प्रदेश सरकार ने किसानों के कल्याण के लिये कई कार्य किये हैं और इसका असर जमीन पर दिख रहा है। जंगली जानवरों के हमलों से निपटने के लिये बाड़ लगाने के वास्ते 80 प्रतिशत सब्सिडी दी जा रही है। हमारी सरकार सिंचाई की व्यवस्था करने के लिये काम कर रही है। समस्या यह है कि पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण पानी के सही स्रोत नहीं हैं। सर्वे के मुताबिक, राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्र 55,67,300 हेक्टेयर है। इसमें वन क्षेत्र 11,05,997 हेक्टेयर, बंजर एवं कृषि अयोग्य भूमि 7,83,404 हेक्टेयर है।

इसके अलावा चारागाह एवं चारन युक्त भूमि 15,03,833 हेक्टेयर है। शुद्ध फसल युक्त क्षेत्र 5,38,412 हेक्टेयर है। प्रदेश की 70 प्रतिशत जनसंख्या की प्रत्यक्ष या परोक्ष आय का स्रोत कृषि है जबकि राज्य के सकल घरेलू उत्पादन में कृषि का योगदान 10 प्रतिशत है। हिमाचल प्रदेश में 87 प्रतिशत जोत लघु एवं सीमांत किसानों की है। प्रदेश में करीब 15 से 20 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न की पैदावार होती है जबकि 15 लाख मीट्रिक टन के आसपास सब्जियों की पैदावार होती है। राज्य में भाजपा विधायक जयराम ठाकुर ने आरोप लगाया कि किसानों और खेती के प्रति कांग्रेस सरकार की कोई रुचि नहीं है। वीरभद्र सिंह के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार केंद्र की योजनाओं को ठीक ढंग से लागू नहीं कर रही है। खेतों में सिंचाई की व्यवस्था करने के लिये प्रदेश सरकार कोई पहल नहीं कर रही है।

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